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Monday, March 30, 2015

दलि‍त साहि‍त्‍य : सांस्‍कृति‍क-नि‍र्माण प्रक्रि‍या पर डॉ रामचंद्र जी ( जे.एन.यू. प्राध्‍यापक) का भाषण।


साेमवार, 30 मार्च 2015, कमरा न.22, Art's Faculty,DU
(प्रो. श्‍यौराज सिंह बेचैन के संयोजन में दो दि‍वसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी)

जनसत्‍ता के संपादक ओम थानवी जी और कबीर पर 7 कि‍ताबें लि‍खने वाले दलि‍त चिंतक डॉ. धर्मवीर कि‍सी कारणवश नहीं आ सके। अंग्रेजी वि‍भाग से प्रो. तपन बासू, और प्रो. राजकुमार  ने अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। वरिष्‍ठ दलि‍त लेखक श्री सूरजपाल चौहान ने भी अपने मंतव्‍य व्‍यक्‍त कि‍ए। 



वि‍डि‍या शायद स्‍मार्टफोन पर न चले। आप इसे लैपटॉप या डेस्‍कटॉप पर देखें।   

1 comment:

डॉ.जि‍तेंद्र भगत said...

सूरजपाल चौहान जी का कहना है कि‍ अंग्रेजों के आने से शि‍क्षा जन-जन तक फैला, बाबा साहेब पढ़ सके, दलि‍त पढ़ सके।
कि‍सी ने अंतर्जातीय या प्रेम वि‍वाह पर प्रश्‍न कि‍या तो उन्‍होंने कहा कि‍ 'ये नहीं होना चाहि‍ए। ये प्रेम नहीं होता, सि‍र्फ वासना होती है।'

मुझे लगता है दलि‍त चिंतन में सीधे नकारने की जीद वि‍चारधारा को गड्ड
मड्ड कर सकती है।