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Sunday, August 7, 2011

'ध्रुवस्‍वामि‍नी' की स्‍त्रि‍यों का प्रश्‍न


'ध्रुवस्‍वामि‍नी' 1933 में प्रकाशि‍त हुई थी। जयशंकर प्रसाद ने अपने इस नाटक में नारी के अस्‍ति‍त्‍व,अधि‍कार और पुनर्लग्‍न की समस्‍या को उठाया है। इसमें प्रसाद ने इन प्रश्‍नों पर वि‍चार कि‍या है कि‍
नारी का समाज में स्‍थान क्‍या है?
क्‍या उसका पुनर्विवाह संभव है?
इस नाटक में दि‍खाया गया है कि‍ वह जि‍स पुरूष(चंद्रगुप्‍त) से प्रेम करती है, उससे विवाह नहीं कर पाती और जि‍ससे(रामगुप्‍त) उसका वि‍वाह हुआ है, उससे वह प्रेम नहीं करती।
इस नाटक में पुरूष सत्‍तात्‍मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोही स्‍वर सुनाई पड़ता है। वैसे तो यहॉ प्रताड़ित स्‍त्री की अवस्‍था का चि‍त्रण इस नाटक में मुख्‍य है परन्‍तु नारी-स्‍वतंत्रता का की आधुनि‍क चेतना के कारण ही इसमें पहली बार प्रति‍क्रि‍या करती है। ध्रुवस्‍वामि‍नी रामगुप्‍त को स्‍पष्‍ट रूप से कह देती है -
'पुरूषों ने स्‍त्रि‍यों को पशु-संपत्‍ति‍ समझकर उसपर अत्‍याचार करने का अभ्‍यास बना लि‍या है। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा, नारी के गौरव को बचा नहीं सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते।'
पुरूषों की प्रभुता तथा प्रेमजाल में फंसकर स्‍त्रि‍यों को हमेशा निराशा, उत्‍पीड़न और उपेक्षा ही मिलती है। नाटककार के शब्‍दों में-
' स्‍त्रि‍यों के बलि‍दान का भी कोई मूल्‍य नहीं। कि‍तनी असहाय दशा है। अपने निर्बल और अवलंब खोजनेवाले हाथों से वह पुरूषों के चरणों को पकड़ती है ओर वह सदैव ही इसको तिरस्‍कार,घृणा से उपेक्षा करता है।'
ध्रुवस्‍वामि‍नी और चंद्रगुप्‍त का पुनर्लग्‍न प्रसाद की प्रगति‍शीलता है क्‍योंकि‍ पौरूष के बल पर नारी को दासी माननेवाले रामगुप्‍त का परित्‍याग कर अपनी इच्‍छा से चंद्रगुप्‍त का वरण करती है। इस नाटक में मंदाकि‍नी जैसे पात्रों की सृष्‍टि‍ की गई है जो जड़ शास्‍त्र के खि‍लाफ आवाज उठाती है कि‍ क्‍या धर्म केवल नारी के अधि‍कारों को छि‍नने के लि‍ए ही है या उन्‍हें कोई सुरक्षा प्रदान करने के लि‍ए भी।
प्रसाद ने नारी समस्‍या तो उठाया है मगर उनका नि‍दान भारतीय चिंतन और परंपरा के आधार पर ही ढ़ूढने का प्रयास कि‍या है।

6 comments:

RAKESH said...

Mai yah to nahi jaanta ki aap kaun hain... lekin aapki GUMNAAMI ki ada behad pasand aayi. Kaash hindi ke swanaamdhanya saahityakaar aapse kuchh seekh paate!
Mai gumnaam to nahi hoon lekin apne `acchhe' padhe hue ko ikatthha karne ka sauk mujhe bhi hai...Shayad aapko bhi mera prayas acchha lage...

bazia said...

thanks kisi ko fayda ho na ho mujhe jaroor hua h so...heartly thanks to u...!

shalini said...

hey sonia ji aapne jo cover page lagaya hai use dekh mujhe aapne college ki yaad aa gyi .... me apne aap ko sobhagya sali manti hu me "dhruwanimi" ka paatra nibha chuki hu or ye page hamare hi college duwar prkashit kiya gya tha........bahut hi sunder or vichaniy nakak hai samaj k lie jo strio k kewal char diwar ka saman maatra mante hai.

संजीव said...

निरंतर रहें ....

chatarsingh gehlot said...

बहुत-खुब

Lokeshna (Lopa) said...

Thanks Sir