Related Posts with Thumbnails

Monday, July 27, 2009

‘ रस्‍मौ रि‍वाज भाखा का दुनि‍या से उठ गया’

तब संस्कृतमि‍श्रि‍त हि‍न्दी को ‘भाषा’ के नाम से जाना जाता था और दूसरी तरफ फारसी मि‍ली हि‍न्दी को ‘उर्दू’ के नाम से जाना जाता था। वह समय 19वीं सदी के आरंभि‍क वर्षों का था। उर्दू के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए मुंशी सदासुखलाल ने तब खेद प्रकट करते हुए कहा था-
‘रस्मौ रि‍वाज भाखा का दुनि‍या से उठ गया’
उसी जमाने के प्रसि‍द्ध शायर इंशाअल्ला खॉं अपनी रचना ‘रानी केतकी की कहानी’ में लि‍खते हैं कि‍ वे ऐसी भाषा में लि‍खना चाहते हैं जि‍समें-
’हिंदवीपन भी न नि‍कले और भाखापन भी न हो।‘
’भाखा’ को लोग भ्रमवश ब्रजभाषा समझ लेते हैं। दरअसल इंशा का ‘भाखापन’ ठेठ हि‍न्दी की स्वीकृति‍ है जि‍समें हि‍न्दी को छोड़कर कि‍सी बोली का पुट न हो। इसप्रकार इंशा की भाषा में तीन प्रकार के शब्दों से परहेज था- अरबी-फारसी/ ब्रजभाषा-अवधी/ संस्कृत।
आचार्य शुक्ल के शब्दों में, इसप्रकार-
इंशा ने ‘भाखापन’ और ‘मुअल्ला्पन’ दोनों को दूर रखने का प्रयत्ना कि‍या।‘
इसलि‍ए इस कोशि‍श में इंशा की भाषा अपने समकालीनों में सबसे ‘चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती’ है। कहीं-कहीं इंशा ने ‘बड़ी प्यारी घरेलू ठेठ भाषा’ का प्रयोग कि‍या है।

(आगे देखेंगे कि‍ उस दौर में उर्दू और खड़ीबोली के बीच कैसी उठापटक चली।)

1 comment:

रंजना said...

Rochak jankariparak v sundar aalekh....aabhar.