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Friday, September 26, 2008

भारतेंदु मंडल के कवि‍यों की राष्‍ट्र-भक्‍ति‍ और राजभक्‍ति‍

छायावाद में नए छंद प्रयोग में आने लगे थे, पि‍छली पोस्‍ट में इसकी चर्चा हो चुकी है। वस्‍तु-वि‍धान के स्‍तर पर भारतेंदु युग, द्वि‍वेदी युग और छायावादी युग में जो एक सतत वि‍कास नजर आता है, उससे काव्‍य अनेकरूपता की ओर अग्रसर होने लगता है। शुक्‍ल जी ने तृतीय उत्‍थान में इन तीनों युगों के वस्‍तु-वि‍धान की सारगर्भित चर्चा की है।
भारतेंदु युग:
भारतेंदु मंडल के कवि‍ देश की बदलती तस्‍वीर से परि‍चि‍त थे, वे अपने काव्‍य में सामाजि‍क और राजनीति‍क स्‍थि‍ति‍ को लेकर लोगों का ध्‍यान आकृष्‍ट कराना चाहते थे, पर वे इसमें ज्‍यादा सफल न हो सके। शुक्‍ल जी के शब्‍दों में-

‘’राजनीति‍क और सामाजि‍क भावनाओं को व्‍यक्‍त करनेवाली वाणी भी कुछ दबी-सी रही। उसमें न तो संकल्‍प की दृढ़ता और न्‍याय के आग्रह का जोश था, न उलटफेर की प्रबल कामना का वेग।‘’

1857 के बाद ईस्‍ट इंडि‍या कंपनी से हटकर शासन ब्रि‍टि‍श की महारानी के हाथों में चली गई थी, और इस व्‍यवस्‍था बदलाव से कुछ बुद्धि‍जीवी आशान्‍वि‍त भी थे। इसलि‍ए यहॉं राष्‍ट्र-भक्‍ति‍ के साथ-साथ राजभक्‍ति‍ के भी स्‍वर मि‍ल जाते हैं। शुक्‍ल जी के अनुसार-
’’स्‍वदेश प्रेम व्‍यंजि‍त करनेवाला यह स्‍वर अवसाद और खि‍न्‍नता का स्‍वर था, आवेश और उत्‍साह का नहीं। उसमें अतीत के गौरव का स्‍मरण और वर्तमान ह्रास का वेदनापूर्ण अनुभव ही स्‍पष्‍ट था।‘’

भारतेंदु युग में कुछ नूतन भाव का समावेश तो हुआ मगर वे काव्‍य के लि‍ए पंरम्परागत पद्धति‍ का ही प्रयोग करते रहे। काव्‍य में ब्रज भाषा का प्रयोग यथावत बना रहा। स्‍वदेश-गौरव और स्‍वदेश-प्रेम की भावना जगाने की कोशि‍श सराहनीय है लेकि‍न वे जीवन के वि‍वि‍ध पक्षों की मार्मिकता की ओर प्रवृत न हो सके।

अगली चर्चा द्वि‍वेदी युग पर।

1 comment:

प्रमोद said...

अच्छा प्रयास है पर थोडी मेहनत की आवश्यकता है. हिन्दी साहित्य पर चर्चा हेतु आप ईमेल करें pkumar8791@gmail.com तथा पधारें http://hindikechirag.blogspot.com