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Saturday, September 20, 2008

क्‍या खड़ी बोली मुसलमानों के द्वारा अस्‍ति‍त्‍व में आई?

रीति‍काल तक ब्रज भाषा में ही साहि‍त्‍य रचा जाता रहा, लेकि‍न इसका अर्थ ये नहीं लगाया जाना चाहि‍ए कि‍ खड़ी बोली अचानक साहि‍त्य में अपना ली गई। आचार्य शुक्‍ल ने स्‍पष्‍ट लि‍खा है कि‍
- ’’कि‍सी भाषा का साहि‍त्‍य में व्‍यवहार न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि‍ उस भाषा का अस्‍ति‍त्‍व ही नहीं था।‘’

ब्रजभाषा के समय खड़ी बोली अन्‍य बोलि‍यों की तरह ही अपने प्रांत तक ही सीमि‍त थी। मुसलमानों के आगमन के बाद और दि‍ल्‍ली दरबार की भाषा से खड़ी बोली के प्रयोग को बल मि‍ला। औरंगजेब के युग में फारसी मि‍श्रि‍त खड़ी बोली (रेखता) में शायरी होने लगी थी। जैसे-जैसे वि‍देशी (अरबी-फारसी) शब्‍दों का प्रयोग खड़ी बोली में बढ़ता गया, वैसे-वैसे एक नई भाषा शैली उर्दू के रूप में सामने आने लगी।

इस भाषा-द्वैत के वि‍वादों का एक अलग ही इति‍हास है, इस पर चर्चा बाद में की जाएगी।) इसलि‍ए यह कहना एक भ्रम है कि‍ खड़ी बोली मुसलमानों के द्वारा अस्‍ति‍त्‍व में आई।

खड़ी बोली के प्राचीन रूप की झलक अपभ्रंश काव्‍य (भोज से हम्‍मीर देव का समय) के भीतर अनेक पद्यों में मि‍ल जाती है। एक बहुचर्चित उदाहरण है-
‘भल्‍ला हुआ जु मारि‍या, बहि‍णि‍ ! म्‍हारा कंतु ।‘
खुसरो ने तो ब्रजभाषा के साथ-साथ खालि‍स खड़ी बोली में भी कुछ पद्य और पहेलि‍यॉं रची थी-
‘एक थाल मोती से भरा।
सबके सि‍र पर औंधा धरा।‘
(आकाश)

अरथ तो इसका बूझेगा।
मुंह देखो तो सूझेगा।
(दर्पण)


खुसरो के बाद भाषा की ये मस्‍ती कबीर में ही दि‍खाई पड़ती है-

कबीर कहता जात हूँ, सुनता है सब कोई।
राम कहे भला होयगा, नहि‍तर भला न होई।।



गद्य में खड़ी बोली पहले-पहल अकबर के जमाने के एक कवि‍ की रचना से ज्ञात होता है-
-’चंद छंद बरनन की महि‍मा’ (गंग कवि‍)


रीति‍काल में जब ब्रजभाषा का बोलबाला था, तब पटि‍याला के दरबार में एक कथावाचक थे- रामप्रसाद नि‍रंजनी। इनकी रचना ‘भाषा योगवाशि‍ष्‍ठ’ (1741) में खड़ी बोली गद्य का परि‍ष्‍कृत रूप नजर आता है। आचार्य शुक्ल ने इसे परि‍मार्जित गद्य की प्रथम पुस्‍तक और रामप्रसाद जी को प्रथम प्रौढ़ गद्यलेखक माना है।

इनके बाद खड़ी बोली गद्य की दो रचनाऍं भी देखने में आती हैं-
-जैन पद्म पुराण का भाषानुवाद (पं. दौलत राम, 1761)
- मंडोवर का वर्णन।


अगली चर्चा में यह देखेंगे कि‍ खड़ी बोली के प्रादुर्भाव में फोर्ट वि‍लि‍यम कॉलेज की क्‍या भूमि‍का रही।

(मूल शीर्षक-हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य का आधुनि‍क काल: खड़ी बोली का गद्य)
-(आचार्य शुक्‍ल से साभार)

9 comments:

दीपक भारतदीप said...

आपकी ज्ञानवद्र्धक जानकारी बहुत अच्छी लगी। वैसे कोई भी भाषा क्रमबद्ध रूप से विकसित होती है और उसका धर्म और जाति से कोई संबंध नहीं होता।
दीपक भारतदीप

संगीता पुरी said...

नई जानकारी मिली। धन्यवाद।

Udan Tashtari said...

आभार इस ज्ञानवर्धक आलेख के लिए.

Shastri said...

खडी बोली पर इस विश्लेषणात्मक आलेख के लिये आभार!!

-- शास्त्री

-- हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाजगत में विकास तभी आयगा जब हम एक परिवार के रूप में कार्य करें. अत: कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर अन्य चिट्ठाकारों को जरूर प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

प्रदीप मानोरिया said...

खादी बोली पर विस्तृत आलेख धन्यबाद ब्लॉग जगत में स्वागत है

Animesh Tiwari said...

बढिया जानकारी दिया आपने, आभार ।

आरंभ

Yatish Jain said...

आप ऐसे ही हमारी जानकारी बडाते रहिये क़तरा-क़तरा

Anonymous said...

ब्‍लागजगत में आपका स्‍वागत। शोधपरक आलेख। अच्‍छी जानकारी।

श्यामल सुमन said...

अच्छी कोशिश। लिखते रहें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com