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Friday, September 19, 2008

हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य का आधुनि‍क काल : ब्रजभाषा गद्य (प्रकरण 1)

आज कई लोग यह जानकर हैरान हो सकते हैं कि‍ हि‍न्दी में नाटक, उपन्‍यास, कहानी, आलोचना, नि‍बंध, आदि‍ गद्य साहि‍त्‍य जो आज वि‍पुल पैमाने पर दि‍खाई दे रहे हैं, उसके चि‍ह्न 150 साल पहले ढूँढ़ने पर भी मि‍लना आसान न था। आधुनि‍ककाल के पूर्व जो भी गद्य हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य में वि‍द्यमान था, उसका रूप प्राय: ब्रज भाषा में पाया जाता है।

देखा जाए तो गद्य का एक नमूना भक्‍ति‍काल (1318-1643) के कृष्‍णकाव्‍य परंपरा में वि‍ट्ठलनाथ जी के ग्रंथ ‘श्रृंगाररस मंडन’ में मि‍लता है, पर इस गद्य का रूप व्‍यवस्‍थि‍त नहीं है।
गद्य का व्‍यवस्‍थि‍त रूप आगे चलकर इन दो ग्रंथों में नजर आता है:-
1) 84 वैष्‍णवों की वार्ता (गोकुलनाथ*)
2) 252 वैष्‍णवों की वार्ता।

नाभादास के अष्‍टयाम (1603) में भगवान राम की दि‍नचर्या का वर्णन गद्य में ही मि‍लता है।

नासि‍केतोपाख्‍यान, बैताल पचीसी (सूरति‍ मि‍श्र,1710), आइने अकबरी की भाषा वचनि‍का (लाला हीरालाल, 1795) भी ब्रज भाषा में लि‍खि‍त गद्य रचनाऍं हैं।
यदि‍ ब्रज का गद्य साहि‍त्‍य वि‍कसि‍त हो गया होता तो खड़ी बोली के गद्य को अपनाने के मार्ग में एक लंबे वि‍वाद का सामना हो सकता था। इसलि‍ए आचार्य शुक्ल ब्रज और खड़ी बोली में इस संभावि‍त ‘भाषा-वि‍प्लव’ के टल जाने को भगवान का अनुग्रह मानते हैं।

अगली पोस्‍ट में प्रकरण 1 के ही अंतर्गत प्रारंभि‍क दौर में खड़ी बोली के गद्य की चर्चा की जाएगी।
(* वि‍वादि‍त)

2 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

आप बहुत दुर्लभ सामग्री अंतर्जाल को आप उपलब्ध करा रही हैं। इसकी हर कडी संग्रहणीय होगी। कृपया गुमनामी से बाहर आयें...

***राजीव रंजन प्रसाद

Udan Tashtari said...

आभार इस आलेख के लिए.